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Hymn No. 1881 | Date: 20-Jul-2000
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दिलजला हूँ मैं पीता हूँ प्यार की धूँट फूंक – फूंककें।
दिलजला हूँ मैं पीता हूँ प्यार की धूँट फूंक – फूंककें।
यार तू ही बता क्या गलती थी मेरी जो नौबत आयी ऐसी।
आज न टाल तू मुझको, वक्त आ गया है परदा उठाने का।
तेरी कृपा से अब तक सहा, सब कुछ सह जायेगे तेरे दम पे।
सनम दिखा सकता है तू उँगली, पर न दिखाना खुद को।
मानता हूँ बनके बेहया किया होगा कूच तेरी गलियों से।
अपने स्वार्थों की दाल गलते न दीखा होगी तो यें परिणति होनी थी।
मानवीय मन है जो रहता है माया के घर पे प्रारब्ध के जाल में फंसके।
मंजूर करता हूँ कि तूने बहुत कृपा, परहम न तोड़ पाये इस फाँस को।
काश हर इक बात मानी होती तेरी, तो न आयी होती नौबत रोने की।


- डॉ.संतोष सिंह