ना चाहिये दुनिया की सलतनत, कितना भी दौड़े मन ओर उस।
Bhajan No.1693 | Date: 27-Apr-2000
ना चाहिये दुनिया की सलतनत, कितना भी दौड़े मन ओर उस।
मैंने किया ना कभी प्यार का नशा, तो कैसे कहूँ मैं कर सकता हूँ प्यार।
हाँ अब चलता नहीं बिना तेरे बिना, जैसे भूल, लगता है कहीं गया कुछ छूट।
तेरी तरह बना नहीं सकता बातें, अब भी है कोई कमजोरियों जो करती है दूर तुझसे।
रब तसव्वुर मिलता नहीं दिल को, जब तक देख ना लूँ तुझे।
कहता है तू करने को, अब भी करता रहता हूँ और कुछ।
सच पूछो तो दिल चाहता है खालीशी प्यार करने को तुझे।
समझाया तूने लाख बार, दायित्वों को निभाते करना है सच्चा प्यार।
यार कब तक चलेंगा ऐसा, दुखाता रहूँगा दिल को बार बार तेरे।
अजीज़ आ गया हूँ अपने आप से, क्या आमूल चूल परिवर्तन हो नहीं सकता मेंरे भीतर।
- डॉ.संतोष सिंह