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Hymn No. 1875 | Date: 18-Jul-2000
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अपलक निहारता रहूँ तुझे, बंद हो जाये श्वास मेरी।
अपलक निहारता रहूँ तुझे, बंद हो जाये श्वास मेरी।
जान होके हो जाऊँ बेजान, तुझे सामने पाके मिट जाये गुमा जीने का।
काश और आस के पंजे से मन छूटके, बदल जाये हकीकत में।
मेरी बानगी मिट जाये सारी, हो जाये जरूरत तू मेरी।
सारी फितरते टकराते ही तुझसे बदल जाये खुशनुमा उमंगों में।
अंत हो जाये मेरे बेगानेपन का, अंतर में प्रकट हो जाये तू।
आऊँ ना किसीके अब दाब में, दिन – रात को भुलाके देखूँ तेरे ख्वाब।
कहकहा लगाये अपने ऊपर, बात – बात पे उढ़ायें चाहे कोई कितना मजाक।
झुठला नहीं सकता दुनिया को, हॉ ढल जाने दे सारी इच्छाओं को प्यार में।
तेरे प्रेम के सहारे त्याग दूँगा कमजोरी का चोला, सही मायने में तेरा हो जाने के वास्ते।


- डॉ.संतोष सिंह