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Hymn No. 1877 | Date: 18-Jul-2000
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कुछ और कह दे, जिससे दिल पे पड़ा परदा उठ जाये।
कुछ और कह दे, जिससे दिल पे पड़ा परदा उठ जाये।
नजरें इनायत कर दें, जिससे मन पे छायी धुंध छट जाये।
लगा दे प्यार की मीठी चपत, झटपट दूर हो जाये अंदर की खटपट।
कुछ और देर बैठ जा, हो जायेगी मेरे अंत में तेरी गहरी पैठ।
शब्दों के तीर तू चलाते जा, हो जायेगा निर्मल चित्त का हर कोना।
नहला दे तेरे प्रेम रस से, बिघ जाये मेरा रोम – रोम तेरे प्यार में।
छेड़ता रह हर पल तू, करूं कुछ भी आने न पाये कोई दूजा ख्याल।
बरसाते रहना कृपा की सुधा, खोया रहूंगा रहूँ मैं जहाँ में कहीं।
पड़ा रहने दे तेरे दर पे, पतित – पावन हो लोट – लोट के।
धुन में मिट जाने दें तेरे, कहां सुनाया जाऊँगा जहाँ में तेरी दाँस्ता बनके।


- डॉ.संतोष सिंह