VIEW HYMN

Hymn No. 521 | Date: 25-Dec-1998
Text Size
तकरार चलती रहती है, दिल में मेरे हर पल संग तेरे ।
तकरार चलती रहती है, दिल में मेरे हर पल संग तेरे ।

कहीं हुयीं तेरी मानता हूँ पर अपनी कहीं ना कहीं कर जाता हूँ।

रोक लें तू मुझें मनमानी करनें से, करकें गुहार लगाता हूँ ।

शरारत अभी बंद ना हुयी है दिल मचल जाता है कई बार ।

दोष ना है मेरा कुछ, जहाँ को तूने बनाया है इतना हसीं ।

रहीं सही कसर पूरी कर देती है, मेरी अतृप्त इच्छायें ।

मजबूर कर देंती है मनको उनकें पीछे – पीछे भागने को ।

प्रारब्ध का ढेर हें जो घेरें रहता है मुझको हर पल ।

इन सबसे छुडाना होगा, मैं तो आशीक हो चुका हूँ तेरा।


- डॉ.संतोष सिंह