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Hymn No. 514 | Date: 19-Dec-1998
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सौगात तूझे देना चाहता हूँ बढियाँ से बढियाँ, अपने दिल के सिवाय कूछ ना पाता हूँ ।
सौगात तूझे देना चाहता हूँ बढियाँ से बढियाँ, अपने दिल के सिवाय कूछ ना पाता हूँ ।
हालत ऐसी है हमारी मैं अपने आपको तेरे कीसी लायक ना पाता हूँ ।
जीतना तू आला है सबका प्यारा, तूझपे लुटाते है सब अकूत दौलत और प्रीत ।
बडबोला मैं और निठल्ला तेरे सामने बैठकें तूझे अपनी बडबड सुनाता हूँ ।
तेरे सम्मान में लोग क्या से क्या काम करकें तेरे नाम कर देतें है ।
मैं तो तूझे रूखे – सुखे गीत सुनाकें, तुझसे कूछ मांग कर बैठता हूँ ।
तेरे भक्तों में मैं सबसे गया गुजरा, सहमा कोनें में बैठ तूझे याद करता हूँ ।
मेरी कोई औकात नहीं तेरे श्रध्दालुओं के सामनें, उनके चरणों की धूलि है प्रसाद मेरा ।
मैं सेवा में रत रहूँ तेरे लोगों के, यहीं हो तेरे प्रति मेरी सच्ची पुजा ।
इतना समर्पित हो जाऊँ तेरे लिये, तू जो चाहें मूझसे वहीं कार्य करता जाऊँ ।


- डॉ.संतोष सिंह